देवघर से जुड़े भूमि विवाद मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। अदालत ने बाबा बैद्यनाथ मेडिकल ट्रस्ट को राहत देते हुए राज्य सरकार और मेडिकल कॉलेज की अपीलें खारिज कर दी हैं। यह मामला सार्वजनिक नीलामी में खरीदी गई भूमि के म्यूटेशन से संबंधित है। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने विस्तृत सुनवाई के बाद यह निर्णय सुनाया। अदालत ने कहा कि राजस्व रिकॉर्ड और स्वामित्व विवाद दोनों अलग-अलग विषय हैं। राजस्व अधिकारी केवल रिकॉर्ड में नाम दर्ज करने का कार्य करते हैं। वे किसी भूमि के मालिकाना हक का अंतिम फैसला नहीं कर सकते। फैसले में अदालत ने प्रशासनिक प्रक्रिया को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि वैधानिक प्रक्रिया का सम्मान किया जाना चाहिए। यह फैसला कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
जानकारी के अनुसार संबंधित भूमि पहले परित्राण मेडिकल कॉलेज के नाम थी। बाद में ऋण नहीं चुकाने के कारण बैंक ने उसे सार्वजनिक नीलामी के लिए रखा। नीलामी प्रक्रिया में बाबा बैद्यनाथ मेडिकल ट्रस्ट ने भूमि खरीदी। ट्रस्ट ने अपने नाम म्यूटेशन के लिए आवेदन किया था। हालांकि आवेदन खारिज होने के बाद मामला अदालत पहुंच गया। एकलपीठ ने ट्रस्ट के पक्ष में फैसला सुनाया था। इसके बाद राज्य सरकार और मेडिकल कॉलेज ने अपील दायर की। खंडपीठ ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रखा था। अब अदालत ने ट्रस्ट के पक्ष में आदेश जारी किया है। इससे लंबे समय से चल रहे विवाद को नई दिशा मिली है।
अदालत ने कहा कि नीलामी खरीदार को वैध अधिकार प्राप्त हैं। राज्य सरकार को ऐसे कदम नहीं उठाने चाहिए जिससे खरीदार को नुकसान पहुंचे। न्यायालय ने यह भी कहा कि आवेदन को अनावश्यक रूप से लंबित रखना उचित नहीं है। हालांकि आवश्यकता प्रमाणपत्र के मुद्दे पर अदालत ने अलग निर्देश दिए हैं। उपायुक्त को भूमि सत्यापन का कार्य निर्धारित समय में पूरा करना होगा। इसके बाद संबंधित प्राधिकारी आवेदन पर निर्णय करेंगे। अदालत ने कहा कि सभी प्रासंगिक तथ्यों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। किसी भी निर्णय में निष्पक्षता और पारदर्शिता जरूरी है। मामले में आगे की कार्रवाई अब प्रशासनिक स्तर पर होगी। इस फैसले को भूमि और संस्थागत विवादों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


