रांची : प्रिवेंटिव डिटेंशन कानून अब नए परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है. झारखंड हाईकोर्ट ने उस कानूनी अस्पष्टता को खत्म कर दिया है, जिसने प्रशासनिक प्रक्रिया को धीमा कर रखा था. अदालत ने साफ किया कि एडवाइजरी बोर्ड का रोल सिर्फ पहली समीक्षा तक सीमित है. इसके बाद हिरासत बढ़ाने का अधिकार राज्य के पास है. यह फैसला CCA 2002 के तहत दिया गया है.
जांच में यह पाया गया कि उपेंद्र यादव के खिलाफ वर्षों से गंभीर मामले दर्ज थे. उसके खिलाफ कई गवाह और FIR मौजूद थे. उसकी गतिविधियों को समाज के लिए खतरा माना गया. उसने कहा कि उसकी हिरासत बढ़ाना अवैध है. लेकिन कोर्ट ने कहा कि अपराध का चरित्र और रिकॉर्ड खुद ही जवाब हैं.
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला उन मामलों को प्रभावित करेगा जहाँ प्रशासन अपराधियों पर नियंत्रण पाने के लिए इस कानून का उपयोग करता है. अब प्रक्रिया कम बाधित होगी और निर्णय तेजी से लिए जा सकेंगे. यह फैसला राज्य की कानून व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

