झारखंड हाईकोर्ट ने बिजली चोरी से जुड़े विवाद में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। यह मामला लगभग पच्चीस साल पुराना बताया गया है। अदालत की खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश को निरस्त कर दिया। पहले बिजली विभाग को राशि लौटाने का निर्देश दिया गया था। उषा मार्टिन लिमिटेड को पांच करोड़ रुपये देने का आदेश था। इसके साथ ब्याज भुगतान की भी व्यवस्था की गई थी। इस आदेश के खिलाफ बिहार स्टेट पावर होल्डिंग कंपनी लिमिटेड ने अपील दायर की। अपील पर विस्तृत सुनवाई की गई। अदालत ने मामले के सभी दस्तावेजों की समीक्षा की। इसके बाद नया निर्णय सुनाया गया।
खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण तथ्य पर ध्यान दिया। तकनीकी विशेषज्ञ की रिपोर्ट को आधार बनाया गया था। लेकिन रिपोर्ट की प्रति संबंधित पक्ष को नहीं दी गई थी। अदालत ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन माना। इसलिए एकल पीठ का आदेश अमान्य कर दिया गया। 2025 में दिया गया फैसला रद्द कर दिया गया। साथ ही वर्ष 2001 के अधिनिर्णायक आदेश को भी समाप्त किया गया। अदालत ने निष्पक्ष प्रक्रिया की आवश्यकता बताई। मामले की दोबारा सुनवाई के निर्देश दिए गए।
यह विवाद वर्ष 2000 में शुरू हुआ था। बिजली चोरी के आरोप में कंपनी की बिजली आपूर्ति काट दी गई थी। बिजली बोर्ड ने भारी राशि का अस्थायी बिल जारी किया था। कंपनी ने अदालत में इस कार्रवाई को चुनौती दी। बिजली बहाल करने के लिए कंपनी ने पांच करोड़ रुपये जमा किए थे। साथ ही पंद्रह करोड़ रुपये की बैंक गारंटी भी दी गई थी। कंपनी ने बाद में जमा राशि वापस करने की मांग की। अब मामले की सुनवाई फिर से होगी। अधिनिर्णायक को तीन महीने में फैसला देना होगा। अदालत के इस आदेश को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।



