उसी समय गुलिकेरा जैसे गांवों में अंधविश्वास की जड़ें अभी भी जिंदा हैं। टुकनी लोंमगा की मौत सिर्फ एक महिला की हत्या नहीं, बल्कि इंसानियत की हार है।
70 साल की वह महिला अपने खेत से लौट रही थी, जब एक शंका ने उनकी जिंदगी छीन ली। उनकी बेटी अब लापता है, और गांव भय व दुख से घिरा हुआ है।
यह घटना याद दिलाती है कि शिक्षा, जागरूकता और संवेदना की कमी अब भी ग्रामीण समाज में त्रासदियां जन्म देती है। अब जरूरत है एक सामाजिक क्रांति की, जो ‘डर’ को ‘ज्ञान’ से बदल सके।



