अदालत ने उनके खिलाफ दिए गए अपने आदेश में से कोई भी टिप्पणी हटाने से साफ इनकार कर दिया है। यह फैसला न्यायपालिका की निष्पक्षता और अपने फैसलों पर दृढ़ता को दर्शाता है, खासकर जब कोई नेता इसमें हस्तक्षेप करने की कोशिश करता है।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इस तरह की याचिकाओं को दायर करने की प्रथा की कड़ी आलोचना की, जिनमें उन न्यायाधीशों के सेवानिवृत्त होने के बाद आदेशों में बदलाव की मांग की जाती है, जिन्होंने ऐसे फैसले लिखे थे। कोर्ट ने कहा कि एक बार फैसला सुनाने के बाद, उसमें बदलाव की मांग करना अनुचित है, खासकर जब फैसला देने वाले जज सेवानिवृत्त हो चुके हों। यह टिप्पणी इस तरह के मामलों में एक नया मानक स्थापित करती है।
इस फैसले के बाद सेंथिल बालाजी के लिए कानूनी मुश्किलें बढ़ गई हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस सख्त रुख से यह संदेश गया है कि न्यायपालिका अपने फैसलों पर कायम रहती है और राजनीतिक दबाव के आगे नहीं झुकती। यह फैसला न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सम्मान को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।


