आज विकास की कमी, बड़े पैमाने पर पलायन और अपनी सांस्कृतिक पहचान के क्षरण जैसे गंभीर मुद्दों से जूझ रहा है। आसन्न चुनाव इस क्षेत्र के राजनीतिक भविष्य की एक बड़ी परीक्षा साबित होने वाले हैं। मतदाता इस बार परंपरा और प्रगति के बीच संतुलन बनाने वाले उम्मीदवार की तलाश में हैं।
वर्तमान चुनावों में, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) जहाँ अपने विकास के दावों पर वोट मांग रहा है, वहीं इंडिया (INDIA) गठबंधन बेरोजगारी, खराब शासन और बुनियादी ढाँचे की कमी को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाकर मैदान में है। मिथिलांचल के युवा रोजगार की तलाश में बड़े शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, जिससे यह क्षेत्र लगभग वीरान होता जा रहा है। बाढ़ की समस्या, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी यहाँ के लोगों की मुख्य शिकायतें हैं।
यह चुनाव केवल राजनीतिक दलों के बीच की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र के अस्तित्व से जुड़ा हुआ है। मिथिलांचल की प्राचीन संस्कृति और मैथिली भाषा को भी सरकारी संरक्षण की कमी के कारण पहचान के संकट का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय लोगों की उम्मीद है कि चुनाव के बाद आने वाली सरकार पलायन रोकेगी, औद्योगिक विकास करेगी और क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित करने के लिए ठोस कदम उठाएगी। इस चुनाव का नतीजा इस बात पर निर्भर करेगा कि मतदाता अपने अतीत की महिमा और वर्तमान की कड़वी हकीकत में किसे चुनते हैं।



