रांची में झारखंड हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में तीन आरोपियों को बरी कर दिया। यह मामला करीब 29 साल पुराने हत्या कांड से जुड़ा हुआ था। अदालत ने कहा कि पर्याप्त साक्ष्य के बिना सजा बरकरार नहीं रखी जा सकती। खंडपीठ ने पूरे मामले के रिकॉर्ड और गवाहों के बयान की समीक्षा की। न्यायालय ने पाया कि अभियोजन पक्ष का मामला कमजोर साबित हुआ। कोर्ट ने कहा कि केवल एक गवाह के बयान पर दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति अरुण कुमार राय की खंडपीठ ने सुनवाई की। अदालत ने संदेह का लाभ आरोपियों को दिया। फैसले के बाद लंबे समय से चल रहा मुकदमा समाप्त हो गया। इस निर्णय को न्यायिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
खंडपीठ ने फरवरी 1998 में दिए गए निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया। सेकेंड एडिशनल जुडिशियल कमिश्नर खूंटी द्वारा सुनाई गई सजा को निरस्त किया गया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाया। दोषसिद्धि और सजा आदेश दोनों को अमान्य घोषित किया गया। तीनों अभियुक्तों को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया गया। चूंकि आरोपी पहले से जमानत पर थे, इसलिए उन्हें बेल बांड से भी राहत दी गई। अदालत ने क्रिमिनल अपील को स्वीकार करते हुए मामला समाप्त किया। फैसले के दौरान कानूनी प्रक्रिया की कमियों पर भी चर्चा हुई। न्यायालय ने निष्पक्ष जांच की आवश्यकता पर जोर दिया। इस निर्णय से न्याय व्यवस्था में साक्ष्य की अहमियत फिर सामने आई।
मामला सत्र वाद संख्या 690/1996 से संबंधित था। वर्ष 1996 में सोनाहातु थाना क्षेत्र में हत्या की घटना हुई थी। मृतक बिशंभर सिंह मुंडा की धारदार हथियारों से हत्या की गई थी। अभियोजन ने जमीन विवाद को हत्या का कारण बताया था। निचली अदालत ने तीन आरोपियों को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा दी थी। आरोपियों में बसुदेव सिंह मुंडा, परशुराम महतो और गणपति महतो शामिल थे। घटना के बाद मामला लंबे समय तक अदालत में लंबित रहा। हाईकोर्ट ने साक्ष्यों की कमी को मुख्य आधार माना। अदालत ने कहा कि संदेह की स्थिति में आरोपी को लाभ दिया जाना चाहिए। फैसले के साथ लगभग तीन दशक पुराना मामला कानूनी रूप से समाप्त हो गया।



