झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य में बायो-मेडिकल वेस्ट के वैज्ञानिक प्रबंधन को लेकर सख्त रुख अपनाया है। वर्ष 2012 से लंबित जनहित याचिका का निष्पादन करते हुए कोर्ट ने कहा कि चिकित्सा कचरे में गंभीर संक्रमण फैलाने की क्षमता होती है। यह कचरा हवा, पानी और मिट्टी को प्रदूषित कर जनस्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। कोर्ट ने माना कि अब राज्य में पर्याप्त नियम और संस्थागत ढांचा मौजूद है। इसलिए प्राथमिक जिम्मेदारी प्रशासन और संबंधित एजेंसियों की बनती है। स्वच्छ पर्यावरण को जीवन के अधिकार का हिस्सा बताया गया है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बायो-मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट रूल 2016 लागू हैं। इन नियमों में कचरे के उत्पादन से लेकर अंतिम निस्तारण तक जवाबदेही तय की गई है। राज्य में पहले स्थिति बेहद खराब थी। रांची, धनबाद और जमशेदपुर में खुले में मेडिकल कचरा पाया गया था। लगातार न्यायिक निगरानी से हालात में सुधार आया है। वर्तमान में छह कॉमन ट्रीटमेंट यूनिट कार्यरत हैं।
खंडपीठ ने राज्य सरकार को कई निर्देश दिए हैं। 30 दिनों में स्टेट नोडल ऑफिसर नियुक्त करने को कहा गया है। सभी अस्पतालों की जिला-वार सूची तैयार करने का आदेश दिया गया है। बार-कोडिंग और डिजिटल ट्रैकिंग लागू होगी। नियम उल्लंघन पर सख्त कानूनी कार्रवाई होगी। कोर्ट ने कहा कि अब प्रशासनिक जिम्मेदारी तय हो चुकी है।



