रांची से एक महत्वपूर्ण न्यायिक फैसला सामने आया है। झारखंड हाईकोर्ट ने धनबाद में होमगार्ड भर्ती से जुड़ी जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। यह मामला 5 दिसंबर 2008 के विज्ञापन से संबंधित था। याचिकाकर्ताओं ने चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि नियमों का उल्लंघन हुआ है। इस आधार पर सभी नियुक्तियां रद्द करने की मांग की गई थी। साथ ही विजिलेंस या सीबीआई जांच की मांग भी की गई थी। मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस एम एस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला PIL के दायरे में नहीं आता। इस फैसले के बाद याचिका खारिज कर दी गई।
कोर्ट ने अपने आदेश में कई अहम बातें कही हैं। खंडपीठ ने कहा कि सेवा मामलों में सामान्यतः जनहित याचिका स्वीकार नहीं की जाती। यदि किसी उम्मीदवार को शिकायत थी तो उसे व्यक्तिगत रूप से कोर्ट आना चाहिए था। कोर्ट ने यह भी कहा कि 2008 की भर्ती अब अप्रासंगिक हो चुकी है। होमगार्ड की नियुक्ति अधिकतम चार वर्षों के लिए होती है। इस अवधि के बाद कई नई भर्तियां हो चुकी हैं। इसलिए इस मामले में कोई प्रभावी राहत नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने यह भी पाया कि जिन उम्मीदवारों की नियुक्ति को चुनौती दी गई, उन्हें पक्षकार नहीं बनाया गया। इससे याचिका कमजोर हो गई।
याचिकाकर्ता नागेश्वर राणा और उपेंद्र शर्मा ने स्थानीयता नियम के उल्लंघन का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि चयनित उम्मीदवार स्थानीय निवासी नहीं थे। इसके समर्थन में आरटीआई से प्राप्त जानकारी का हवाला दिया गया था। हालांकि सरकार के वकील ने इसका विरोध किया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने सभी पक्षों की दलील सुनने के बाद फैसला सुनाया। अंत में याचिका को बिना किसी लागत के खारिज कर दिया गया। इस फैसले को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे भविष्य में ऐसे मामलों पर प्रभाव पड़ सकता है। न्यायालय ने स्पष्ट संदेश दिया है कि सेवा मामलों में PIL सीमित है।



